एक नज़र में
- व्याकरण रटाने के बजाय बातचीत के जरिए अंग्रेजी सिखाने पर जोर दिया गया है।
- रोजाना 30 मिनट के बोलने के अभ्यास से बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाया जा सकता है।
- अंग्रेजी बुद्धिमत्ता का पैमाना नहीं है, लेकिन यह उच्च शिक्षा और रोजगार के द्वार खोलती है।
एक कॉलम में बेंगलुरु का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि कैसे लोग व्याकरण की किताबों के बजाय रोजमर्रा की बातचीत से नई भाषा सीख रहे हैं। इसी तरह उत्तर भारत के हिंदी मीडियम स्कूलों में भी बच्चों को अंग्रेजी बोलना सिखाया जा सकता है।
अक्सर बच्चे सात साल तक अंग्रेजी पढ़ने और व्याकरण के नियम याद रखने के बाद भी धाराप्रवाह अंग्रेजी में तीन वाक्य नहीं बोल पाते हैं, क्योंकि उन्हें पढ़ना सिखाया जाता है बोलना नहीं।
सुझाव दिया गया है कि स्कूलों में महंगे साधनों के बजाय रोज 30 मिनट अंग्रेजी बोलने का अभ्यास कराया जाए। शुरुआत खुद का परिचय देने और छोटे वाक्यों से की जा सकती है।
बच्चों को एक-दूसरे के साथ बातचीत करने का अभ्यास करना चाहिए और गलतियों पर हंसने के बजाय एक सहायक माहौल मिलना चाहिए, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ सके।
लेख में स्पष्ट किया गया है कि अंग्रेजी बुद्धिमत्ता का पैमाना नहीं है, लेकिन यह उच्च शिक्षा और रोजगार के नए अवसर जरूर खोलती है।
खबर का संदर्भ
यह लेख मुख्य रूप से शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी पढ़ाने के पारंपरिक तरीकों की समीक्षा करता है और व्यावहारिक बातचीत के अभ्यास को प्राथमिकता देने की वकालत करता है।
EXPLAINED
आपके सवाल, सीधे जवाब
01. स्कूलों में अंग्रेजी सिखाने का सबसे अच्छा तरीका क्या बताया गया है?
बच्चों को अंग्रेजी में बात करने के लिए एक साथी देना और व्याकरण रटाने की बजाय रोजाना बातचीत का अभ्यास कराना।
02. बच्चों को अंग्रेजी बोलने का अभ्यास कैसे कराया जा सकता है?
रोजाना 30 मिनट तक खुद को इंट्रोड्यूस करने, सवाल पूछने और सामान्य बातचीत का अभ्यास करके।
