एक नज़र में
- त्योहारों के दौरान स्कूल और अभिभावक बच्चों का क्षेत्रीय ज्ञान बढ़ा सकते हैं।
- विभिन्न राज्यों में स्थानीय देवी-देवताओं और लोककथाओं से जुड़ी मान्यताएं हैं।
- अभिभावकों को बच्चों को पंडालों में घुमाते समय क्षेत्रीय परंपराओं की जानकारी देनी चाहिए।
एन. रघुरामन के एक कॉलम में बताया गया है कि त्योहारों के दौरान स्कूल और अभिभावक बच्चों का क्षेत्रीय ज्ञान बढ़ा सकते हैं। बचपन की एक घटना का जिक्र करते हुए कॉलम में बताया गया है कि कैसे नागपुर के एक स्कूल में छुट्टियों से पहले सामान्य ज्ञान की कक्षाओं में अलग-अलग क्षेत्रों की लोककथाएं और देवी-देवताओं के रूपों से जुड़ी कहानियां सिखाई जाती थीं।
लेख के अनुसार, देश के विभिन्न राज्यों में देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है और हर रूप के साथ स्थानीय कथाएं जुड़ी होती हैं। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु के कुंभकोणम में ‘मारी-अम्मन’ को बारिश और रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है, जिनकी मान्यता से बीमारियां दूर होने की बात कही जाती है।
इसके अलावा, महाराष्ट्र में धाराशिव की तुलजा भवानी को छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी के रूप में जाना जाता है। इसी तरह गुजरात के गिरनार में अंबाजी के मंदिरों और गरबा नृत्य के नाम के पीछे की पौराणिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का भी उल्लेख किया गया है।
लेखक का सुझाव है कि बच्चों के साथ पंडालों में जाते समय अभिभावक उन्हें इन क्षेत्रीय रीति-रिवाजों और स्थानीय कहानियों से परिचित कराएं, जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके।
खबर का संदर्भ
यह लेख एन. रघुरामन के व्यक्तिगत अनुभवों और सांस्कृतिक मान्यताओं पर आधारित है, जिसमें त्योहारों और क्षेत्रीय लोककथाओं के माध्यम से बच्चों में सामान्य ज्ञान बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
EXPLAINED
आपके सवाल, सीधे जवाब
01. तमिलनाडु के कुंभकोणम में किस देवी की पूजा की जाती है?
कुंभकोणम में ‘मारी-अम्मन’ के रूप में देवी की पूजा की जाती है, जहां मारी का अर्थ बारिश से है।
02. तुलजा भवानी किस ऐतिहासिक शासक की कुलदेवी थीं?
तुलजा भवानी छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी थीं।
