एक नज़र में
- वर्ष 2016 के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच कोई उच्चस्तरीय वार्ता नहीं हुई है।
- भारत की विदेश नीति में बदलाव के तहत अब यह रुख अपनाया गया है कि बातचीत और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते।
- पाकिस्तान की परमाणु हथियारों की धारणा को 'ऑपरेशन सिंदूर' के साथ चुनौती दी गई।
कांग्रेस नेता शशि थरूर के एक कॉलम के अनुसार दशकों तक भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव के बाद तनाव कम होने और शांति वार्ता शुरू होने का चक्र चलता था, लेकिन अब यह सिलसिला टूट चुका है। वर्ष 2016 के बाद से दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय वार्ता नहीं हुई है।
लेख में बताया गया है कि 1947, 1965 और 1971 के पारंपरिक युद्धों में मनचाहा परिणाम न मिलने के बाद पाकिस्तान ने 1980 के दशक के उत्तरार्ध से आतंकवाद आधारित रणनीति अपनाई। भारत की शांति पहलों, जैसे 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर यात्रा और 2008 की वार्ताओं का जवाब सैन्य उकसावे या आतंकवादी घटनाओं से मिला।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में शपथ ग्रहण में नवाज शरीफ को बुलाने और लाहौर जाने जैसे प्रयास किए, लेकिन पठानकोट हमले की जांच के दौरान पाकिस्तान की संयुक्त जांच टीम द्वारा इसे भारत का स्वांग बताए जाने पर भारत का धैर्य समाप्त हो गया।
इसके बाद भारत ने यह सिद्धांत अपनाया कि बातचीत और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते और भारत तभी वार्ता करेगा जब पाकिस्तान आतंकवादियों को ध्वस्त करेगा। साथ ही 'ऑपरेशन सिंदूर' के जरिए भारत ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के डर की धारणा को भी चुनौती दी।
खबर का संदर्भ
यह लेख भारत और पाकिस्तान के कूटनीति तथा सैन्य संबंधों में आए ऐतिहासिक बदलावों और पुरानी रणनीतियों के विफल होने का विश्लेषण करता है।
EXPLAINED
आपके सवाल, सीधे जवाब
01. भारत और पाकिस्तान के बीच उच्चस्तरीय वार्ता कब से बंद है?
वर्ष 2016 के बाद से दोनों देशों के बीच कोई उच्चस्तरीय वार्ता नहीं हुई है।
