स्वस्थ शरीर का रहस्य: बार-बार भोजन नहीं, संतुलित जीवनशैली ही है समाधान Healthy Lifestyle Policy Buzz

Political update: Policy buzz: आधुनिक जीवनशैली और खान-पान की आदतों पर बढ़ती चिंता के बीच, विशेषज्ञों द्वारा स्वस्थ रहने के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डाला जा रहा है। हाल के अवलोकन यह दर्शाते हैं कि हमारा शरीर लगातार कुछ न कुछ खाते रहने के लिए नहीं बना है, और इस बुनियादी सच्चाई को समझने से हम कई स्वास्थ्य समस्याओं से बच सकते हैं। विशेष रूप से मोटापे की बढ़ती समस्या के संदर्भ में यह बात और भी प्रासंगिक हो जाती है।

हाल ही में, मुंबई के एक प्रतिष्ठित सर्जन के व्यक्तिगत अनुभव ने स्वास्थ्य और जीवनशैली पर एक गहरा विचार प्रस्तुत किया। अपने क्षेत्र में एक साधारण जीवन जीने वाले इस चिकित्सक ने पिछले दो वर्षों में लगभग दस किलो वजन कम किया है। पहले भी उनका वजन अधिक नहीं था, पर अब 5 फुट 9 इंच की ऊंचाई पर उनका वजन लगभग 60 किलो है। उन्होंने बताया कि यह उपलब्धि उन्होंने संयमित खान-पान, नियमित शारीरिक गतिविधि और पर्याप्त नींद के माध्यम से हासिल की है। लोग उन्हें देखकर अक्सर आश्चर्यचकित हो जाते हैं कि उन्होंने इतना वजन कैसे घटा लिया, पर वे स्वयं को पहले से कहीं अधिक ऊर्जावान, स्फूर्तिदायक और आत्मविश्वास से भरपूर महसूस करते हैं।

आजकल वजन घटाने वाली दवाओं का जबरदस्त प्रचार देखने को मिल रहा है। आने वाले समय में जैसे-जैसे कुछ और दवाएं पेटेंट मुक्त होंगी, उनके प्रचार में और भी तेजी आएगी। हालांकि भारत में दवाओं का सीधा विज्ञापन कानूनी रूप से मान्य नहीं है, कंपनियां इसके लिए अलग-अलग तरीके ढूंढ लेती हैं। ठीक वैसे ही जैसे तंबाकू या शराब के लिए ‘सरोगेट मार्केटिंग’ का सहारा लिया जाता है, जहां उसी नाम से कोई अन्य उत्पाद बाजार में उतारा जाता है और उसका प्रचार किया जाता है। लेकिन मोटापे की असली जड़ कहीं और है, सिर्फ दवाएं इसका स्थायी समाधान नहीं हैं।

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ अत्यधिक संसाधित (प्रोसेस्ड) भोजन न केवल आसानी से उपलब्ध है, बल्कि अक्सर स्वस्थ, संयमित भोजन की तुलना में सस्ता भी पड़ता है। इन उत्पादों पर बड़े पैमाने पर विज्ञापन किए जाते हैं और ये चौबीसों घंटे उपलब्ध रहते हैं। लेकिन असलियत यह है कि हमारा शरीर बार-बार खाते रहने के लिए बना ही नहीं है।

* मानव शरीर लगातार भोजन ग्रहण करने के लिए नहीं बना है।
* ऐतिहासिक रूप से, अधिकांश लोग दिन में केवल दो बार भोजन करते थे।
* अत्यधिक संसाधित (प्रोसेस्ड) और सस्ते खाद्य पदार्थ मोटापे के मुख्य कारणों में से हैं।
* बार-बार खाने से शरीर में इंसुलिन का स्तर बढ़ता है और भूख पहचानने की क्षमता कम हो जाती है।
* स्थायी वजन घटाने के लिए जीवनशैली और आहार में बदलाव आवश्यक हैं, न कि सिर्फ दवाएं।
* धीरे-धीरे वजन घटाने से मांसपेशियों को नुकसान नहीं होता और परिणाम अधिक टिकाऊ होते हैं।

यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें, तो लगभग 200 साल पहले तक अधिकांश लोग दिन में केवल दो बार ही भोजन करते थे। और उससे भी पहले, आदिमानव को जब भोजन उपलब्ध होता था, तभी वह कुछ खाता था। परंतु आज की हमारी दिनचर्या ऐसी है कि हम लगभग हर दो-तीन घंटे में कुछ न कुछ खा लेते हैं। इस निरंतर खाने की आदत से शरीर में इंसुलिन का स्तर लगातार उच्च बना रहता है। धीरे-धीरे मस्तिष्क का वह केंद्र, जो तृप्ति का संकेत देता है, कम संवेदनशील हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि हमें अपनी वास्तविक भूख की पहचान ही नहीं रह जाती। इसी अव्यवस्थित खान-पान का परिणाम अक्सर मोटापा होता है।

और फिर, इसी मोटापे के उपचार के लिए बाजार में नई-नई दवाएं लाई जाती हैं। यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वजन घटाने वाली दवाओं की भूमिका कुछ विशिष्ट चिकित्सकीय स्थितियों में हो सकती है, जहाँ विशेषज्ञ की सलाह अनिवार्य है। लेकिन एक स्थायी और गहरा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने के लिए केवल दवाओं पर निर्भर रहना अपर्याप्त है। जीवनशैली में सुधार और आहार संबंधी आदतों में सकारात्मक परिवर्तन लाए बिना ये दवाएं टिकाऊ परिणाम नहीं दे सकतीं। जब हम अपने भोजन और जीवनशैली में सोच-समझकर बदलाव लाते हैं और धीरे-धीरे वजन कम करते हैं, तो इसके प्रभाव अधिक गहरे और स्थायी होते हैं। इस प्रक्रिया में शरीर की मांसपेशियां भी सुरक्षित रहती हैं, जो समग्र स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।
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  • मानव शरीर लगातार भोजन ग्रहण करने के लिए नहीं बना है।
  • ऐतिहासिक रूप से, अधिकांश लोग दिन में केवल दो बार भोजन करते थे।
  • अत्यधिक संसाधित (प्रोसेस्ड) और सस्ते खाद्य पदार्थ मोटापे के मुख्य कारणों में से हैं।
  • बार-बार खाने से शरीर में इंसुलिन का स्तर बढ़ता है और भूख पहचानने की क्षमता कम हो जाती है।
  • स्थायी वजन घटाने के लिए जीवनशैली और आहार में बदलाव आवश्यक हैं, न कि सिर्फ दवाएं।
  • धीरे-धीरे वजन घटाने से मांसपेशियों को नुकसान नहीं होता और परिणाम अधिक टिकाऊ होते हैं।

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स्रोत: Dainik Bhaskar

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