संसदीय गतिरोध: लोकतांत्रिक परम्पराओं का क्षरण और जवाबदेही का सवाल Parliamentary Gridlock Democracy Crisis
Policy buzz: Political update: भारतीय लोकतंत्र का केंद्रबिंदु, हमारी संसद, इन दिनों अपने सुचारु संचालन को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। विशेषकर बजट सत्र के दौरान देखने को मिला निरंतर गतिरोध उन लोगों के लिए चिंता का विषय है जो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में गहरी आस्था रखते हैं। सत्र के दौरान सम्मानित संसदीय परम्पराओं का लगातार टूटते रहना एक कष्टप्रद अनुभव रहा है।
यह पहली बार नहीं है जब किसी प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का पारंपरिक उत्तर देने से रोका गया हो। वर्ष 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी यह अवसर नहीं मिला था। हालांकि, इस बार एक नया दृष्टांत तब सामने आया जब प्रधानमंत्री स्वयं उस समय लोकसभा में अनुपस्थित थे, जब धन्यवाद प्रस्ताव को मतदान के लिए रखा जाना था। विपक्ष-प्रेरित हंगामे ने न केवल धन्यवाद प्रस्ताव पर होने वाली बहस को बेमानी बना दिया, बल्कि देश के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बजट पर चर्चा भी अराजकता की भेंट चढ़ती हुई दिखाई दी।
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में न तो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और न ही कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष, किसी ऐसे समाधान में रुचि दिखा रहा है जिससे संसद के तीन वार्षिक सत्रों में सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले बजट सत्र को अपेक्षित गंभीरता मिल सके। यह स्थिति भारतीय राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं है, जहां संवाद और चर्चा को सर्वोपरि माना जाता है।
**मुख्य बिंदु:**
* बजट सत्र के दौरान संसद में बढ़ते गतिरोध और ध्वस्त होती परंपराओं पर चिंता।
* प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह) को धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब देने से रोका जाना।
* सत्ता पक्ष को संसदीय अवरोध से असहज सवालों से बचने का अवसर मिलता है।
* विपक्ष, खासकर कांग्रेस, हंगामे को तर्कपूर्ण बहस से अधिक प्रभावी मानती है।
* विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक दलों द्वारा संसद बाधित करने की पुरानी प्रवृत्ति।
* पूर्व नेताओं ने भी संसद में गतिरोध को लोकतंत्र का हिस्सा बताया था।
वास्तव में, सदन में बार-बार होने वाले व्यवधान और स्थगन सत्ताधारी भाजपा के लिए एक प्रकार से सुविधाजनक साबित होते हैं। यह उन्हें कई बार असहज और तीखे सवालों से बचने का एक आसान मौका प्रदान करता है। दूसरी ओर, विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस, इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके हैं कि केवल हंगामा और नारेबाजी ही जनता तक उनके संदेश को गंभीर व तर्कपूर्ण बहसों की तुलना में अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचा सकती है। यह सोच लोकतांत्रिक सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है।
संसद के इतिहास को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक दलों के बीच गतिरोध पैदा करने की यह धारणा लगभग एक सामान्य प्रवृत्ति बन चुकी है। कांग्रेस-नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के कार्यकाल में जब अरुण जेटली राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे, तब उन्होंने खुले तौर पर कहा था कि संसद में अवरोध पैदा करना अलोकतांत्रिक नहीं है। इसके एक वर्ष बाद, 2012 में लोकसभा में उनकी समकक्ष सुषमा स्वराज ने भी इसी दृष्टिकोण को दोहराते हुए कहा था कि संसद को नहीं चलने देना भी लोकतंत्र का ही एक रूप है।
इस प्रवृत्ति के कई उदाहरण बीते वर्षों में देखने को मिले हैं। 1995 में, जब भाजपा विपक्ष में थी, तब उसने तत्कालीन नरसिंह राव सरकार के दूरसंचार मंत्री सुखराम पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर पूरे शीतकालीन सत्र को ठप कर दिया था। इसी तरह, 2001 में, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौरान कांग्रेस ने तो तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का पूरी तरह से बहिष्कार ही कर दिया था। फर्नांडिस का नाम तहलका टेप प्रकरण में सामने आया था, और कांग्रेस सांसदों ने उन्हें संसद में बोलने से लगातार रोका था।
यह परिदृश्य एक व्यापक सवाल खड़ा करता है: क्या भारत की संसदीय लोकतंत्र बहस, संवाद और आम सहमति के बजाय सिर्फ गतिरोध का अखाड़ा बनकर रह जाएगा? संसद का सुचारु संचालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी केवल किसी एक पक्ष की नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों की साझा है।
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- बजट सत्र के दौरान संसद में बढ़ते गतिरोध और ध्वस्त होती परंपराओं पर चिंता।
- प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह) को धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब देने से रोका जाना।
- सत्ता पक्ष को संसदीय अवरोध से असहज सवालों से बचने का अवसर मिलता है।
- विपक्ष, खासकर कांग्रेस, हंगामे को तर्कपूर्ण बहस से अधिक प्रभावी मानती है।
- विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक दलों द्वारा संसद बाधित करने की पुरानी प्रवृत्ति।
- पूर्व नेताओं ने भी संसद में गतिरोध को लोकतंत्र का हिस्सा बताया था।
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स्रोत: Dainik Bhaskar
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