मातृत्व की उलझन: समाज को ‘कोख’ चाहिए, ‘स्त्री’ क्यों नहीं? राजनीति Women’s Identity Motherhood Politics

Leader spotlight: Policy buzz: समाज में मातृत्व और महिला की पहचान को लेकर हमेशा से बहस छिड़ी रहती है। आज हम उस विरोधाभास पर बात करेंगे जहाँ गर्भवती महिला की पहचान को लेकर सवाल उठते हैं।

शादी के बाद भारतीय समाज में महिलाओं पर अक्सर संतानोत्पत्ति का भारी दबाव बढ़ जाता है। “कब खुशखबरी दे रही हो?”, “उम्र बढ़ रही है, परिवार कब बढ़ाओगी?”, “करियर तो बन गया, अब माँ कब बनोगी?”, “इतनी दुबली हो, बच्चा कैसे होगा?” – ऐसे सवाल हर तरफ से घेर लेते हैं। समाज को गर्भधारण की अवधारणा, उसकी घोषणा और सोशल मीडिया पर अल्ट्रासाउंड की तस्वीरें बहुत प्रिय हैं। यह एक अमूर्त विचार के रूप में पूजनीय है, जिसे ‘हार्ट इमोजी’ के साथ साझा किया जाता है। डॉक्टर बार-बार इशारों में याद दिलाते हैं, रिश्तेदार मंडराते हुए पूछताछ करने लगते हैं। पूरा समाज एक तय डेडलाइन वाले किसी पब्लिक-प्रोजेक्ट की तरह महिला को ‘जल्दी प्रेग्नेंट होने’ का आदेश देता रहता है।

लेकिन जैसे ही यह ‘खुशखबरी’ एक जीवंत, शारीरिक वास्तविकता का रूप लेती है, जैसे ही गर्भधारण स्पष्ट रूप से दिखने लगता है, हमारा समाज असहज होने लगता है। दिल्ली में अभिनेत्री सोनम कपूर की गर्भावस्था के दौरान की पोशाक को लेकर हुए विवाद ने इस विरोधाभास को फिर उजागर किया। एक महिला जो अपने आराम, आत्मविश्वास या खुशी के लिए कपड़े पहन रही थी, अचानक समाज की कसौटी पर चढ़ गई। अचानक सुर बदल जाते हैं: “ढका-छुपा रखो”, “यह शालीनता नहीं है”, “एक होने वाली माँ को ऐसा नहीं दिखना चाहिए।” महिलाओं को इसी प्रकार के विरोधाभासी जाल में फंसाया गया है। उनसे संतानोत्पत्ति की अपेक्षा की जाती है, लेकिन माँ बनते ही उनसे उनके अपने व्यक्तित्व को मिटाने की मांग की जाती है।

* समाज को गर्भवती महिला का ‘विचार’ पसंद है, पर ‘वास्तविक’ गर्भावस्था से वह असहज हो जाता है।
* गर्भावस्था के शारीरिक परिवर्तनों पर समाज महिला पर शालीनता और नैतिकता का दबाव बनाता है।
* मातृत्व की अपेक्षा की जाती है, लेकिन माँ बनने पर महिला से उसकी व्यक्तिगत पहचान और इच्छाओं को त्यागने की मांग होती है।
* समाज को केवल ‘कोख’ और ‘त्याग’ चाहिए, न कि एक स्वतंत्र, आत्मसम्मान वाली और शारीरिक जरूरतों वाली स्त्री।
* गर्भवती महिला का अपने लिए आराम, पोषण और ध्यान मांगना समाज को बेचैन करता है, जिस पर वह नियंत्रण स्थापित करना चाहता है।
* मातृत्व का अर्थ महिला की इच्छाओं, आत्मसम्मान या पहचान को खत्म कर देना नहीं है; गर्भवती महिला एक पूर्ण मनुष्य है।

हम मातृत्व को एक आदर्श मानते हैं, पर जब यही मातृत्व मूर्त रूप लेता है, तो हम उस पर लोक-लाज और नैतिकता के पहरे बिठा देते हैं। समाज को गर्भधारण चाहिए, पूरी स्त्री नहीं; त्याग चाहिए, स्वतंत्र व्यक्ति नहीं; बच्चा चाहिए, परंतु उस शरीर की कोई परवाह नहीं जिसने असहनीय दर्द, शारीरिक फैलाव और अनगिनत परिवर्तनों से गुजरकर उस जीवन को आकार दिया। एक गर्भवती देह जब अपने स्वाभाविक स्वरूप पर शर्मिंदा नहीं होती, बल्कि सहज दिखती है, तो यह समाज को बेचैन कर देता है। वह शारीरिक रूप से बढ़ती है, लोगों की नज़रों में आती है, और अपने लिए उचित आराम, पोषण तथा विशेष ध्यान की अपेक्षा रखती है। वह चुपचाप सब सहन नहीं करती। इसलिए, समाज उसे तुरंत अनुशासित करने दौड़ पड़ता है – कभी ‘अच्छी सलाह’ या ‘निर्णय’ के आवरण में, तो कभी ‘नैतिकता’ का भारी बोझ लादकर।

जब कोई गर्भवती स्त्री अपनी खुशी और पसंद के अनुसार कपड़े पहनती है, या अपने शरीर की जरूरतों को प्राथमिकता देती है, तो यह इस बात की याद दिलाता है कि मातृत्व का अर्थ अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं, आत्मसम्मान या अपनी पहचान को मिटा देना नहीं है। एक गर्भवती महिला एक पूर्ण, जीवंत इंसान है – अपनी चमक के साथ, अपनी थोड़ी-सी जटिलताओं के साथ। लेकिन हमारा समाज अक्सर इस तथ्य को स्वीकारने में हिचकिचाता है कि एक गर्भवती महिला को उसकी संपूर्णता में स्वीकार करना कितना महत्वपूर्ण है।

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  • समाज को गर्भवती महिला का ‘विचार’ पसंद है, पर ‘वास्तविक’ गर्भावस्था से वह असहज हो जाता है।
  • गर्भावस्था के शारीरिक परिवर्तनों पर समाज महिला पर शालीनता और नैतिकता का दबाव बनाता है।
  • मातृत्व की अपेक्षा की जाती है, लेकिन माँ बनने पर महिला से उसकी व्यक्तिगत पहचान और इच्छाओं को त्यागने की मांग होती है।
  • समाज को केवल ‘कोख’ और ‘त्याग’ चाहिए, न कि एक स्वतंत्र, आत्मसम्मान वाली और शारीरिक जरूरतों वाली स्त्री।
  • गर्भवती महिला का अपने लिए आराम, पोषण और ध्यान मांगना समाज को बेचैन करता है, जिस पर वह नियंत्रण स्थापित करना चाहता है।
  • मातृत्व का अर्थ महिला की इच्छाओं, आत्मसम्मान या पहचान को खत्म कर देना नहीं है; गर्भवती महिला एक पूर्ण मनुष्य है।

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स्रोत: Dainik Bhaskar

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