Policy buzz: Government watch: भारत के राजनीतिक परिदृश्य में यह एक कटु सत्य है कि देश के कर्णधार अक्सर उन मुद्दों से दूरी बना लेते हैं, जिनका सीधा संबंध उनके वोट बैंक से नहीं होता। हिमालय क्षेत्र, जो भारत की जलवायु और जीवन रेखा का महत्वपूर्ण हिस्सा है, इस राजनीतिक उपेक्षा का सबसे बड़ा भुक्तभोगी बन रहा है। हाल ही में हिमालयी पर्यावरण पर आधारित दो महत्वपूर्ण शोध रिपोर्टों को नजरअंदाज किया गया, जिनमें सर्दियों में जंगलों में लगने वाली आग के कारणों और भूस्खलन के नए संवेदनशील क्षेत्रों की विस्तृत जानकारी दी गई थी। इस चुप्पी ने देश के नीति-निर्माताओं के गैर-जिम्मेदाराना रवैये को उजागर किया है।
यह विडंबना ही है कि हमारे देश के राजनीतिक दल अत्यंत संवेदनशील पर्यावरणीय विषयों को गंभीरता से लेने से कतराते हैं। ऐसी जानकारियों को अक्सर राजनीतिक घोषणापत्रों में जगह नहीं मिलती, क्योंकि उन्हें लगता है कि इनसे मतदाताओं पर कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा। जन-जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाले पर्यावरण संबंधी मुद्दों को दरकिनार करना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
वन सर्वेक्षण विभाग (फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया) के ताजा आंकड़ों ने हिमालयी राज्यों में बिगड़ती स्थिति की भयावह तस्वीर पेश की है। इस सर्दी के मौसम में, 1 नवंबर से अब तक उत्तराखंड में देश में सबसे अधिक 1,756 बार जंगल की आग लगने की सूचना मिली है। यह संख्या महाराष्ट्र (1,028), कर्नाटक (924), मध्य प्रदेश (868) और छत्तीसगढ़ (862) जैसे राज्यों से कहीं अधिक है, जो पारंपरिक रूप से अपनी अधिक अग्नि-संवेदनशीलता के लिए जाने जाते हैं।
आम तौर पर दिसंबर का महीना जंगल की आग के लिहाज से अपेक्षाकृत शांत माना जाता है, लेकिन पिछले तीन वर्षों में उत्तराखंड के लिए यह धारणा पूरी तरह से गलत साबित हुई है। इस वर्ष दिसंबर में उत्तराखंड में बिल्कुल भी बारिश नहीं हुई, जिसके कारण जंगल की जमीन में नमी का स्तर बेहद कम हो गया है। उत्तराखंड की ही तरह, हिमाचल प्रदेश में भी पिछले साल अक्टूबर के पहले सप्ताह से कोई महत्वपूर्ण वर्षा दर्ज नहीं की गई है। इसके परिणामस्वरूप, कुल्लू, मंडी, शिमला और चंबा जैसे प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों में बर्फबारी लगभग नगण्य रही है, जिससे जंगलों में आग लगने की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि हुई है।
* राजनीतिक दलों द्वारा हिमालयी पर्यावरण संकट की लगातार अनदेखी की जा रही है।
* उत्तराखंड में नवंबर से अब तक 1,756 जंगल की आग के अलर्ट दर्ज हुए, जो राष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक है।
* दिसंबर में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बारिश और बर्फबारी की भारी कमी।
* प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों में बर्फबारी न होने से कृषि पर नकारात्मक प्रभाव।
* देहरादून और ऋषिकेश जैसे शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) खतरनाक स्तर पर।
* एक अध्ययन के अनुसार, जंगल की आग का वायु प्रदूषण में 15-20% तक योगदान है।
जंगलों में बढ़ती आग की ये घटनाएं अब सीधे तौर पर पर्यावरण प्रदूषण से भी जुड़ रही हैं। देहरादून, ऋषिकेश और हल्द्वानी जैसे उत्तराखंड के प्रमुख शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) लगातार ‘बेहद खराब’ श्रेणी में बना हुआ है। देहरादून में तो कई बार यह सूचकांक 300 के पार जा चुका है, जो सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा माना जाता है।
उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण बोर्ड द्वारा किए गए एक अध्ययन ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। इस शोध से पता चला है कि राज्य में होने वाले कुल पर्यावरण प्रदूषण में जंगल की आग की भूमिका 15 से 20 प्रतिशत तक है। यह एक अत्यंत गंभीर आंकड़ा है, जो दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों का यह घातक संयोजन हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और वहां रहने वाले लोगों के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है, जिस पर तत्काल ध्यान देना अनिवार्य है। Stay updated with साधनान्यूज़.com for more news।
- राजनीतिक दलों द्वारा हिमालयी पर्यावरण संकट की लगातार अनदेखी की जा रही है।
- उत्तराखंड में नवंबर से अब तक 1,756 जंगल की आग के अलर्ट दर्ज हुए, जो राष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक है।
- दिसंबर में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बारिश और बर्फबारी की भारी कमी।
- प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों में बर्फबारी न होने से कृषि पर नकारात्मक प्रभाव।
- देहरादून और ऋषिकेश जैसे शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) खतरनाक स्तर पर।
- एक अध्ययन के अनुसार, जंगल की आग का वायु प्रदूषण में 15-20% तक योगदान है।
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स्रोत: Prabhasakshi
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