अरावली पर्वतमाला पर सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी नज़र: अवैध खनन रोकने को जनभागीदारी… Supreme Court Aravalli Mining Watch
Leader spotlight: Government watch: भारत की प्राचीनतम पर्वतमाला, अरावली, पर अवैध खनन की बढ़ती चिंता को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने गहरी गंभीरता व्यक्त की है। यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि बेरोकटोक अवैध खनन गतिविधियों ने इस ऐतिहासिक पर्वत श्रृंखला को भीतर से खोखला कर दिया है, जिससे इसके पारिस्थितिक संतुलन और भूगर्भीय महत्व को भारी क्षति पहुंची है।
हाल ही में, 21 जनवरी को, सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ – जिसमें मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली शामिल थे – ने अरावली के संरक्षण और अवैध खनन की जड़ पर प्रहार करने पर विशेष जोर दिया। न्यायालय ने अपने स्पष्ट निर्देशों को दो मुख्य भागों में प्रस्तुत किया है। एक ओर, इसने अरावली क्षेत्र में अवैध खनन पर प्रभावी रोक लगाने और इसके लिए एक ठोस कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं। दूसरी ओर, इसने ‘अरावली पर्वतमाला’ को विधिवत परिभाषित करने के मुद्दे पर अलग से विचार करने का आह्वान किया है, ताकि संरक्षण प्रयासों को और अधिक सटीक बनाया जा सके।
* सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली में अवैध खनन पर गहरी चिंता व्यक्त की।
* 21 जनवरी को पीठ ने अवैध खनन रोकने और संरक्षण पर जोर दिया।
* अवैध खनन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए कार्ययोजना बनाने का निर्देश।
* अरावली पर्वतमाला को परिभाषित करने के मुद्दे पर अलग से विचार करने का आह्वान।
* न्यायालय ने विशेषज्ञ समिति के गठन और सुझाव मांगे।
* चार सप्ताह के भीतर कार्ययोजना और विशेषज्ञ नामों पर दोबारा सुनवाई होगी।
अरावली पर्वतमाला के 100 मीटर के दायरे से संबंधित पूर्व के ‘केप्ट इन एवियांस’ आदेश को यथावत रखा गया है, और इस मामले में विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने के लिए नाम और सुझाव मांगे गए हैं। न्यायालय ने चार सप्ताह के भीतर अगली सुनवाई तक इस कार्ययोजना और विशेषज्ञों के नामों को प्रस्तुत करने का समय दिया है। अवैध खनन गतिविधियों के प्रति न्यायालय ने विशेष गंभीरता प्रदर्शित की है, यह स्पष्ट करते हुए कि यह केवल पर्यावरणविदों का ही नहीं, बल्कि पूरे समाज और देश का सरोकार है।
अरावली पर्वतमाला, जिसका निर्माण अनुमानतः 2 अरब वर्ष पूर्व प्रोटेरोज़ोइक युग में हुआ था, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर और गुजरात तक फैली हुई है। राजस्थान के लगभग 20 जिले इस पर्वतमाला के अंतर्गत आते हैं, जो मेसेनरी स्टोन से लेकर महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों के विशाल भंडार समेटे हुए है। वैध और अवैध खनन के बीच की बहस को यदि एक तरफ रख कर देखें, तो यह निर्विवाद है कि अरावली को वैध खनन से कहीं अधिक नुकसान अवैध गतिविधियों से हुआ है। क्षेत्रीय विश्लेषण दर्शाता है कि राजस्थान की तुलना में हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्रों में अरावली को ज्यादा क्षति पहुंची है।
अब समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी के साथ इस धरोहर को बचाने का है। अरावली पर्वतमाला का संरक्षण न केवल वर्तमान की मांग है, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता भी है।
Stay updated with साधनान्यूज़.com for more news.
- सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली में अवैध खनन पर गहरी चिंता जताई।
- न्यायमूर्ति सूर्यकांत, जॉयमाल्या बागची और विपुल एम. पंचोली की पीठ ने संरक्षण पर जोर दिया।
- अवैध खनन पर प्रभावी रोक और कार्ययोजना बनाने के निर्देश दिए गए।
- अरावली पर्वतमाला को परिभाषित करने और विशेषज्ञ समिति बनाने के सुझाव मांगे गए।
- चार सप्ताह के भीतर कार्ययोजना और विशेषज्ञ नामों पर दोबारा सुनवाई होगी।
- अरावली को वैध खनन से अधिक नुकसान अवैध गतिविधियों से हुआ है, खासकर हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में।
Stay updated with साधनान्यूज़.com for more news.
स्रोत: Prabhasakshi
अधिक पढ़ने के लिए: Technology Trends
