पाकिस्तान को झटका: अमेरिकी दबाव में सऊदी अरब ने JF-17 लड़ाकू जेट सौदे से बनाई दू… Us Pressure Halts Jf-17 Deal

World today: International spotlight: वैश्विक भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है, जहां सऊदी अरब ने पाकिस्तान और चीन के संयुक्त उपक्रम JF-17 थंडर फाइटर जेट की खरीद के संभावित सौदे से पीछे हटने का संकेत दिया है। यह घटनाक्रम पाकिस्तान के लिए एक बड़ा आर्थिक और रणनीतिक झटका माना जा रहा है, जिसकी मुख्य वजह अमेरिका का बढ़ता दबाव बताया जा रहा है। इस निर्णय ने क्षेत्र में हथियारों के बाजार और शक्ति संतुलन पर गहरा प्रभाव डाला है।

जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान और चीन मिलकर JF-17 थंडर लड़ाकू विमान का निर्माण करते हैं, और पाकिस्तान अज़रबैजान के बाद सऊदी अरब से एक बड़े ऑर्डर की उम्मीद कर रहा था। यह सौदा पाकिस्तान के लिए न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था। ऐसी अटकलें थीं कि सऊदी अरब इन जेट्स को खरीदकर सूडान जैसे अफ्रीकी और क्षेत्रीय देशों को सैन्य सहायता प्रदान कर सकता है, जिससे पाकिस्तान को मध्य पूर्व और अफ्रीकी बाजारों में अपनी रक्षा निर्यात क्षमता बढ़ाने का मौका मिलता। हालांकि, अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद रियाद ने इस संभावित समझौते से दूरी बनाने का स्पष्ट संकेत दिया है। यह कदम पाकिस्तान के लिए एक बड़ा आघात है, जो अपनी पहले से ही चरमराई अर्थव्यवस्था को सहारा देने और रक्षा निर्यात के माध्यम से महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा अर्जित करने की कोशिश कर रहा है।

अमेरिका नहीं चाहता कि चीन समर्थित लड़ाकू विमान खाड़ी क्षेत्र में अपनी पैठ बनाएं, क्योंकि यह क्षेत्र दशकों से अमेरिकी हथियारों का एक प्रमुख बाजार रहा है और उसकी सुरक्षा रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सऊदी वायुसेना वर्तमान में F-15 ईगल जैसे अत्याधुनिक अमेरिकी प्लेटफॉर्म्स पर पूरी तरह से निर्भर है, और अमेरिका इस निर्भरता को बनाए रखना चाहता है। वाशिंगटन की प्राथमिकता है कि भविष्य में सऊदी अरब उसके पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ जेट F-35 लाइटनिंग 2 को खरीदे, जो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में उसकी तकनीकी श्रेष्ठता को बनाए रखेगा। तुर्की के ‘काम’ कार्यक्रम को लेकर भी अमेरिका पूरी तरह से सतर्क है, ताकि क्षेत्र में किसी अन्य शक्ति के माध्यम से उसके प्रभाव को चुनौती न मिले।

सऊदी अरब ‘विजन 2030’ के तहत अपनी रक्षा स्रोतों में विविधता लाना चाहता है और स्थानीय रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाना चाहता है। यह उसकी दीर्घकालिक रणनीतिक योजना का हिस्सा है। हालांकि, उसकी वर्तमान सुरक्षा संरचना अभी भी बड़े पैमाने पर अमेरिकी सैन्य समर्थन और प्रौद्योगिकी पर टिकी हुई है। इसी संवेदनशील रणनीतिक संतुलन के कारण रियाद को फिलहाल सावधानी बरतनी पड़ी है, ताकि वह अपने सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा सहयोगी, अमेरिका, के साथ अपने संबंधों को जोखिम में न डाले।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही अत्यधिक कर्ज के बोझ तले दबी हुई है और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) कार्यक्रमों पर अत्यधिक निर्भर है। रक्षा निर्यात उसके लिए विदेशी मुद्रा कमाने का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आशाजनक जरिया बन सकता था। JF-17 की अंतर्राष्ट्रीय बिक्री से पाकिस्तान को न केवल आर्थिक लाभ मिलते, बल्कि यह उसकी रणनीतिक पहुंच और सैन्य-औद्योगिक क्षमता को भी दर्शाता। इस सौदे के रुकने से यह संभावित कमाई फिलहाल अटक गई है, जिससे पाकिस्तान के आर्थिक संकट और विदेशी मुद्रा की कमी पर और दबाव बढ़ने की आशंका है। सितंबर में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक रक्षा सहयोग समझौता भी हुआ था, जिसमें सुरक्षा सहयोग को औपचारिक रूप दिया गया था, जिससे इस सौदे की उम्मीदें और भी प्रबल हो गई थीं। इस झटके से पाकिस्तान की क्षेत्रीय भू-राजनीतिक स्थिति भी प्रभावित हो सकती है। वैश्विक रक्षा बाजार में यह घटनाक्रम कई देशों के लिए महत्वपूर्ण सबक प्रस्तुत करता है। ऐसे और अंतर्राष्ट्रीय अपडेट्स के लिए, Stay updated with साधनान्यूज़.com for more news.

  • सऊदी अरब ने अमेरिका के दबाव में JF-17 थंडर लड़ाकू जेट सौदे से पीछे हटने का संकेत दिया है।
  • यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ा आर्थिक और रणनीतिक झटका है, जो रक्षा निर्यात से महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा अर्जित करना चाहता था।
  • अमेरिका खाड़ी क्षेत्र में चीनी समर्थित लड़ाकू विमानों की घुसपैठ को रोकना चाहता है और सऊदी अरब को अपने अत्याधुनिक F-35 जेट बेचने का इच्छुक है।
  • सऊदी अरब अपनी रक्षा ज़रूरतों में विविधता लाना चाहता है, लेकिन उसकी सुरक्षा व्यवस्था अभी भी अमेरिकी सैन्य समर्थन पर अत्यधिक निर्भर है।
  • इस सौदे के रुकने से पाकिस्तान की पहले से ही संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा संकट पर और दबाव बढ़ने की आशंका है।

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स्रोत: Prabhasakshi

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