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अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे से उत्तर प्रदेश की राजनीति में गर्माहट: UGC नियमों… Alankar Agnihotri Resigns Up Politics

India news: भारत समाचार: बरेली के नगर मजिस्ट्रेट पद से अलंकार अग्निहोत्री के त्यागपत्र ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में अचानक हलचल मचा दी है। इस घटनाक्रम ने प्रदेश में एक नई ‘अगड़ा बनाम पिछड़ा’ बहस को जन्म दे दिया है, जिससे मोदी और योगी सरकार दोनों के लिए एक गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है।

अलंकार अग्निहोत्री, जो प्रांतीय प्रशासनिक सेवा के 2019 बैच के अधिकारी हैं, ने 26 जनवरी को अपने पद से इस्तीफा देकर कई मोर्चों पर सत्ता को सीधे चुनौती दी है। उनके इस कदम ने सामाजिक असंतोष, वैचारिक मतभेदों और शासन बनाम प्रशासन की बहस को खुलकर सामने ला दिया है। अपने त्यागपत्र के साथ जारी बयान में, अग्निहोत्री ने उत्तर प्रदेश में ‘ब्राह्मण विरोधी माहौल’ बनने का आरोप लगाया है। उन्होंने प्रयागराज माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिष्यों और वृद्ध संतों के साथ कथित मारपीट की घटना का उल्लेख करते हुए प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने इसे सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि आस्था और सम्मान पर सीधा आघात बताया।

यूजीसी के नए नियमों पर भी उन्होंने केंद्र सरकार पर जमकर हमला बोला। अग्निहोत्री ने ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ (UGC) के ‘फैकल्टी रिक्रूटमेंट’ से संबंधित 2026 के नए नियमों को ‘काला कानून’ करार दिया। इन नियमों के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में सहायक प्रोफेसरों की भर्ती में आरक्षण के मानकों में कथित बदलाव और सामान्य वर्ग के हितों पर संभावित प्रतिकूल प्रभाव को लेकर पहले से ही बहस छिड़ी हुई है। अग्निहोत्री का तर्क है कि ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने के नाम पर लाए गए हैं, लेकिन वास्तव में ये शैक्षणिक वातावरण को खंडित करेंगे और सामान्य वर्ग के छात्रों व शिक्षकों में असुरक्षा की भावना पैदा करेंगे। उनका यह बयान मौजूदा सरकार की शिक्षा नीतियों पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।

यह मुद्दा अब मोदी-योगी सरकार के लिए एक दोहरी धार वाली तलवार बन गया है। एक ओर, यदि सरकार यूजीसी के इन विवादास्पद नियमों को वापस नहीं लेती है, तो आगामी चुनावों में सवर्ण समुदाय की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां सवर्ण मतदाताओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। दूसरी ओर, यदि नियम वापस लिए जाते हैं, तो पिछड़ा समुदाय नाखुश हो सकता है, जिसे इन नियमों से लाभ की उम्मीद है और जो सरकार के पारंपरिक वोट बैंक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में सरकार के लिए कोई बीच का रास्ता खोजना बेहद मुश्किल प्रतीत हो रहा है, जो दोनों समुदायों को संतुष्ट कर सके। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस स्थिति को नजरअंदाज करना भाजपा के लिए महंगा साबित हो सकता है।

भाजपा, जिसे हाल ही में लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी, के लिए यह चुनौती ऐसे समय आई है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में केवल सवा साल का समय शेष है। अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे और उनके द्वारा सवर्णों को ‘व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होने’ का आह्वान करने के साहस ने निश्चित रूप से सरकार और भाजपा की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ा दी हैं। यह घटनाक्रम न केवल प्रशासनिक स्तर पर बल्कि सामाजिक और राजनीतिक धरातल पर भी एक गहरे विभाजन को दर्शाता है, जिसका समाधान निकालना सत्तारूढ़ दल के लिए आसान नहीं होगा।

इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक विशेषज्ञों की पैनी नजर है कि सरकार इस नाजुक स्थिति से कैसे निपटती है। अधिक समाचारों के लिए साधनान्यूज़.com से जुड़े रहें।

  • अलंकार अग्निहोत्री ने बरेली नगर मजिस्ट्रेट पद से इस्तीफा दिया, जिससे उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई।
  • उनके इस्तीफे ने प्रदेश में ‘अगड़ा बनाम पिछड़ा’ की बहस को तेज किया।
  • अग्निहोत्री ने यूजीसी के नए नियमों को ‘काला कानून’ बताया और ‘ब्राह्मण विरोधी माहौल’ का आरोप लगाया।
  • मोदी-योगी सरकार यूजीसी नियमों को लेकर ‘सवर्ण’ और ‘पिछड़ा’ दोनों समुदायों की नाराजगी के बीच फंसी है।
  • यह घटनाक्रम भाजपा के लिए आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया है।
  • इस्तीफे ने सामाजिक असंतोष और शासन-प्रशासन के बीच टकराव की बहस को उजागर किया।

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स्रोत: Prabhasakshi

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