📅 31 मार्च 2026 | SadhnaNEWS Desk
🔑 मुख्य बातें
- वृंदावन में बंदरों का आतंक श्रद्धालुओं और वीवीआईपी के लिए एक बड़ी समस्या है।
- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सहित कई राष्ट्रपतियों को वृंदावन यात्रा के दौरान बंदरों से खतरा रहा है।
- बंदर श्रद्धालुओं से चश्मा छीन लेते हैं और खाने की चीजें मिलने पर ही वापस करते हैं।
वृंदावन: धार्मिक स्थलों पर बंदरों का आतंक एक गंभीर समस्या बनी हुई है, जिससे श्रद्धालुओं और वीवीआईपी आगंतुकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। वृंदावन में बंदरों की समस्या दशकों से चली आ रही है, और आज तक इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। यह एक यक्ष प्रश्न है कि कब तक इन स्थानों पर आने वाले श्रद्धालु बंदरों के आतंक को झेलते रहेंगे और कब तक वे इनका शिकार होते रहेंगे। हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 19 मार्च को वृंदावन के दौरे पर थीं, जो उनके कार्यकाल में दूसरी बार था।
पूर्व राष्ट्रपतियों प्रणब मुखर्जी और रामनाथ कोविंद भी अपने कार्यकाल में दो बार वृंदावन आए थे। द्रौपदी मुर्मू वृंदावन के तीन दिवसीय प्रवास पर आने वाली पहली राष्ट्रपति हैं। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और ज्ञानी जैल सिंह एक बार वृंदावन आए थे। उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए डॉक्टर शंकरदयाल शर्मा, आर वेंकटरमन और डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी वृंदावन अपनी धार्मिक यात्रा पर आ चुके हैं। निवर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी दो बार वृंदावन आए और आश्रय सदन में वृद्ध विधवा माताओं से मुलाकात की थी।
राष्ट्रपति पद पर रहते हुए प्रणब मुखर्जी पहली बार 16 नवंबर 2014 को अक्षयपात्र में चंद्रोदय मंदिर के भूमि पूजन में आए थे। दूसरी बार वे 18 नवंबर 2015 को चैतन्य महाप्रभु के वृंदावन आगमनोत्सव के पांच सौवें वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए थे। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए ज्ञानी जैल सिंह 1987 में वृंदावन आए और रंगजी मंदिर में दर्शन करने पहुंचे थे। 1957 में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद वृंदावन आए थे। उप राष्ट्रपति पद पर रहते हुए 1985 में आर वेंकटरमन, 1993 में डॉ. शंकरदयाल शर्मा और 1959 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन वृंदावन आ चुके हैं।
राष्ट्रपति या कोई वीवीआईपी जब भी वृंदावन आता है, उनकी सुरक्षा एक बड़ी चिंता होती है। लेकिन, सुरक्षा के साथ-साथ सबसे बड़ा काम होता है वीवीआईपी को यहां के झपटमार बंदरों से बचाना। ये बंदर झपटामार कर श्रद्धालुओं का चश्मा उतारते हैं और किसी ऊंची जगह, पेड़ या दीवार पर जाकर बैठ जाते हैं। ये चश्मा तभी लौटाते हैं जब उन्हें खाने के लिए फ्रूटी, केला या दूसरे खाने के सामान दिए जाएं। बंदरों की इस समस्या से निपटने के लिए प्रशासन को कई बार लंगूर के कटआउट लगाने पड़ते हैं ताकि बंदर डर कर भाग जाएं, लेकिन यह समाधान स्थायी नहीं है।
धार्मिक स्थलों पर बंदरों का आतंक एक गंभीर समस्या है जिसके समाधान के लिए स्थायी और प्रभावी उपाय खोजने की आवश्यकता है। श्रद्धालुओं और वीवीआईपी को सुरक्षित वातावरण प्रदान करने के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन को मिलकर काम करना होगा। बंदरों के पुनर्वास और उन्हें भोजन उपलब्ध कराने के लिए उचित व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि वे श्रद्धालुओं को परेशान न करें। इसके अतिरिक्त, लोगों को बंदरों के साथ व्यवहार करने के बारे में शिक्षित करना भी महत्वपूर्ण है ताकि वे सुरक्षित रहें और बंदरों को नुकसान न पहुंचाएं। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वृंदावन जैसे धार्मिक स्थलों पर आने वाले सभी लोग शांतिपूर्ण और सुरक्षित वातावरण में अपनी धार्मिक यात्रा का आनंद ले सकें। राजनीति और नेताओं को इस समस्या के समाधान के लिए आगे आना चाहिए।
🔍 खबर का विश्लेषण
यह खबर धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा और प्रबंधन की कमी को उजागर करती है। बंदरों का आतंक न केवल श्रद्धालुओं के लिए असुविधाजनक है, बल्कि वीवीआईपी की सुरक्षा के लिए भी खतरा है। इस समस्या का समाधान खोजने में स्थानीय प्रशासन और सरकार की विफलता चिंताजनक है। यह आवश्यक है कि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाए और स्थायी समाधान खोजा जाए ताकि धार्मिक स्थलों पर आने वाले सभी लोग सुरक्षित महसूस करें। चुनाव के समय यह मुद्दा राजनीति में भी उठाया जा सकता है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
❓ वृंदावन में बंदरों की समस्या क्या है?
वृंदावन में बंदरों की समस्या एक पुरानी समस्या है जहाँ बंदर श्रद्धालुओं से खाने की चीजें और चश्मा छीन लेते हैं, जिससे उन्हें परेशानी होती है। यह समस्या वीवीआईपी आगंतुकों के लिए भी एक चुनौती है।
❓ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू वृंदावन कब आई थीं?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 19 मार्च को वृंदावन के दौरे पर थीं, जो उनके कार्यकाल में दूसरी बार था। वे वृंदावन के तीन दिवसीय प्रवास पर आने वाली पहली राष्ट्रपति हैं।
❓ बंदर श्रद्धालुओं से चश्मा क्यों छीनते हैं?
बंदर श्रद्धालुओं से चश्मा इसलिए छीनते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि वे चश्मा तभी लौटाएंगे जब उन्हें खाने के लिए फ्रूटी, केला या दूसरे खाने के सामान दिए जाएंगे। यह एक तरह से उनका तरीका है भोजन प्राप्त करने का।
❓ बंदरों की समस्या से निपटने के लिए क्या उपाय किए जाते हैं?
बंदरों की समस्या से निपटने के लिए प्रशासन कई बार लंगूर के कटआउट लगाता है ताकि बंदर डर कर भाग जाएं। हालांकि, यह समाधान स्थायी नहीं है और बंदर जल्द ही इस आदत को अपना लेते हैं।
❓ वृंदावन में बंदरों की समस्या का स्थायी समाधान क्या हो सकता है?
वृंदावन में बंदरों की समस्या का स्थायी समाधान खोजने के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन को मिलकर काम करना होगा। बंदरों के पुनर्वास और उन्हें भोजन उपलब्ध कराने के लिए उचित व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि वे श्रद्धालुओं को परेशान न करें।
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Source: Agency Inputs
| Published: 31 मार्च 2026
