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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: हरीश राणा को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की अनुमति

राष्ट्रीय
📅 11 मार्च 2026 | SadhnaNEWS Desk

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: हरीश राणा को 'पैसिव यूथेनेशिया' की अनुमति - SadhnaNEWS Hindi News


🔑 मुख्य बातें

  • सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की अनुमति दी, जो भारत में इस तरह का पहला मामला है।
  • अदालत ने माना कि हरीश राणा की स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है, उनका जीवन मेडिकल ट्यूब से चल रहा है।
  • यह फैसला भारत में सम्मान के साथ मरने के अधिकार के कानून में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक ऐतिहासिक फैसले में हरीश राणा नामक व्यक्ति को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी। यह भारत में इस तरह का पहला मामला है, जिसमें 2018 के कॉमन कॉज जजमेंट के तहत तय कानूनी ढांचे का पालन किया गया है, जिसे 2023 में अपडेट किया गया था। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने यह फैसला सुनाया, जो भारत में सम्मान के साथ मरने के अधिकार के कानून में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।

यह आदेश 32 वर्षीय हरीश राणा के पिता की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया, जो एक इमारत से गिरने के बाद पिछले 13 सालों से इर्रिवर्सिबल वेजिटेटिव स्टेट (कभी ठीक न हो सकने वाली निष्क्रिय अवस्था) में हैं। अदालत ने इस बात पर विचार किया कि हरीश राणा की स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है और उनका जीवन केवल मेडिकल ट्यूब के माध्यम से दिए जा रहे भोजन पर निर्भर है।

अदालत ने माना कि 2018 की गाइडलाइंस में इस पहलू को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया था कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु को उन मामलों में कैसे लागू किया जाए जहां मरीज का जीवन फीडिंग ट्यूब से चल रहा हो। वेंटिलेटर जैसे लाइफ सपोर्ट को हटाने का तरीका हरीश राणा के मामले में लागू नहीं हो पा रहा था, क्योंकि उनका जीवन सीधे तौर पर वेंटिलेटर पर निर्भर नहीं था, बल्कि फीडिंग ट्यूब से चल रहा था।

हरीश राणा के माता-पिता ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उनके बेटे को सम्मान के साथ मरने की अनुमति दी जाए। उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के अस्पताल में चल रहे मेडिकल ट्रीटमेंट को हटाने की इजाजत दे दी, जिससे उन्हें गरिमापूर्ण मृत्यु प्राप्त हो सके। इस फैसले से ‘पैसिव यूथेनेशिया’ के संबंध में कानूनी अस्पष्टता दूर हो गई है।

यह फैसला न केवल हरीश राणा के परिवार के लिए एक राहत है, बल्कि उन सभी लोगों के लिए भी एक उम्मीद की किरण है जो ऐसी ही परिस्थितियों में फंसे हुए हैं। यह फैसला भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के कानूनी और नैतिक पहलुओं पर एक नई बहस को जन्म दे सकता है। सरकार और न्यायपालिका को इस मुद्दे पर और अधिक स्पष्टता लाने के लिए मिलकर काम करना होगा।

यह फैसला देश में ‘राइट टू डिग्निटी’ (गरिमा के साथ जीने का अधिकार) की अवधारणा को और मजबूत करता है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए तत्पर है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल कायम करेगा और अन्य अदालतों को मार्गदर्शन प्रदान करेगा। प्रधानमंत्री ने भी इस फैसले का स्वागत किया है।

भविष्य में, इस फैसले से प्रेरित होकर, सरकार निष्क्रिय इच्छामृत्यु के संबंध में और अधिक व्यापक कानून बना सकती है, जो मरीजों और उनके परिवारों को बेहतर विकल्प प्रदान कर सके। यह आवश्यक है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर समाज में जागरूकता फैलाई जाए और लोगों को इसके कानूनी और नैतिक पहलुओं के बारे में शिक्षित किया जाए।

🔍 खबर का विश्लेषण

यह फैसला ‘पैसिव यूथेनेशिया’ के संबंध में कानूनी अस्पष्टता को दूर करता है और उन लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो ऐसी ही परिस्थितियों में फंसे हुए हैं। यह भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के कानूनी और नैतिक पहलुओं पर एक नई बहस को जन्म देगा और भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल कायम करेगा। यह फैसला देश में ‘राइट टू डिग्निटी’ को मजबूत करता है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

❓ पैसिव यूथेनेशिया क्या है?

पैसिव यूथेनेशिया एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें मरीज को दी जा रही जीवन रक्षक प्रणालियों को हटा दिया जाता है, जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है। यह सक्रिय इच्छामृत्यु से अलग है, जिसमें मरीज को जानबूझकर मारने के लिए कदम उठाए जाते हैं।

❓ सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति क्यों दी?

सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति इसलिए दी क्योंकि वे पिछले 13 सालों से इर्रिवर्सिबल वेजिटेटिव स्टेट में थे और उनकी स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं थी। उनका जीवन केवल मेडिकल ट्यूब के माध्यम से दिए जा रहे भोजन पर निर्भर था।

❓ इस फैसले का भारत में कानून पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

यह फैसला भारत में पैसिव यूथेनेशिया के संबंध में कानूनी अस्पष्टता को दूर करेगा और भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल कायम करेगा। यह फैसला देश में ‘राइट टू डिग्निटी’ (गरिमा के साथ जीने का अधिकार) की अवधारणा को और मजबूत करता है।

❓ क्या यह फैसला सभी के लिए पैसिव यूथेनेशिया का रास्ता खोलता है?

यह फैसला केवल उन मामलों पर लागू होता है जहां मरीज इर्रिवर्सिबल वेजिटेटिव स्टेट में है और उसकी स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है। हर मामले की परिस्थितियों का मूल्यांकन अलग-अलग किया जाएगा।

❓ पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया कैसे काम करती है?

पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया में, अस्पताल मरीज को दी जा रही जीवन रक्षक प्रणालियों को हटा देता है, जैसे कि वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब। इसके बाद, मरीज स्वाभाविक रूप से मर जाता है। इस प्रक्रिया को डॉक्टर की देखरेख में किया जाता है।

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Source: Agency Inputs
 |  Published: 11 मार्च 2026

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