पाकिस्तान का आतंकवाद विरोधाभास: आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का बढ़ता दौर Pakistan Terrorism Paradox Unfolds

Leader spotlight: Political update: पाकिस्तान एक बार फिर आंतरिक उथल-पुथल के गहन दौर में फँसता दिख रहा है। हालांकि यह उसकी पुरानी राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों का ही पुनरावृत्ति है, लेकिन इस बार इसका सामना कहीं अधिक जटिल क्षेत्रीय और आर्थिक परिस्थितियों में हो रहा है। हाल के दिनों में बलूच विद्रोहियों और इस्लामवादी आतंकवादियों के बीच हुए संघर्षों में भारी जनहानि हुई है, जिसमें सुरक्षा बलों को भी काफी नुकसान पहुंचा है। ऐसी घटनाएँ अब कोई अपवाद नहीं रही हैं।

एक ओर, बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने बलूचिस्तान में पाकिस्तान सेना के साथ सीधी झड़पों के ज़रिये अपने विद्रोही अभियान को तेज़ कर दिया है। दूसरी ओर, हरनाई और पंजगुर में हाल ही में हुए सैन्य अभियानों का उद्देश्य तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के नेटवर्क को ध्वस्त करना प्रतीत होता है। अलगाववादी विद्रोह और वैचारिक आतंकवाद की यह दोहरी आंतरिक चुनौती पाकिस्तान के लिए नई नहीं है; अतीत में भी इसने देश को गहरे संकट में डाला है।

फिलहाल, पाकिस्तानी सेना की आंतरिक तैनाती अभी ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़ब जैसे बड़े पैमाने पर नहीं पहुँची है, लेकिन पूर्व के अनुभव बताते हैं कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष अक्सर उसी दिशा में धकेल देते हैं। बड़े पैमाने पर सेना की आंतरिक तैनाती अपने साथ कई जोखिम भी लाती है, जैसे कि नागरिक क्षेत्रों का सैन्यीकरण, देश में राजनीतिक अस्थिरता और बाहरी सीमाओं से सैनिकों को हटाने की आवश्यकता।

पाकिस्तान की मौजूदा आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों को समझने के लिए कुछ प्रमुख बिंदु:
* **दोहरी चुनौती:** बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में इस्लामवादी आतंकवाद, दोनों एक साथ सिर उठा रहे हैं।
* **रणनीतिक चूक:** पाकिस्तान आतंकवाद को एक सुरक्षागत समस्या मानता है, जबकि इसकी जड़ें गहरी वैचारिक कट्टरता में छिपी हैं, जिसे वह अनदेखा करता रहा है।
* **अप्रभावी प्रतिक्रिया:** चरमपंथी विचारों और कट्टरता के नेटवर्क को तोड़ने या धार्मिक सोच में सुधार लाने के लिए कोई ठोस या स्थायी प्रयास नहीं किए गए हैं।
* **सैन्य समाधान पर निर्भरता:** बलूच विद्रोह से निपटने के लिए लगभग पूरी तरह से सैन्य बल का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे समस्या और जटिल हो सकती है।
* **अफगानिस्तान का प्रभाव:** पड़ोसी अफगानिस्तान अस्थिरता का स्रोत बन गया है, जहाँ से पाकिस्तान को कमजोर करने वाली गतिविधियाँ संचालित होने की आशंका है।

16 दिसंबर 2014 को पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए हमले की भयावह स्मृति आज भी पाकिस्तान की रणनीतिक चेतना में गहरे घाव छोड़ गई है। जिन परिस्थितियों ने उस हमले को जन्म दिया था, उन्हें आज तक पूरी तरह से समाप्त नहीं किया गया है। यहीं पाकिस्तान का स्थायी विरोधाभास उजागर होता है: वह इस्लामवादी आतंकवाद को महज एक सुरक्षा चुनौती मानता है, न कि एक गहरी वैचारिक समस्या।

कट्टरता के जाल को तोड़ने, धार्मिक सोच में सुधार लाने या समाज के भीतर चरमपंथी विचारों का खंडन करने के लिए कोई निरंतर प्रयास नहीं किया गया है। वहीं, बलूच विद्रोह से लगभग पूरी तरह से सैन्य बल के उपयोग से ही निपटा जा रहा है। ये दो बिल्कुल अलग प्रकार के संघर्ष हैं, लेकिन पाकिस्तान दोनों से एक ही घिसे-पिटे और आजमाए हुए तरीकों से निपट रहा है।

क्षेत्रीय आयाम इस समस्या को और भी जटिल बना देता है। आज का अफगानिस्तान केवल पाकिस्तान का पड़ोसी नहीं, बल्कि ऐसा क्षेत्र है जहाँ से पाकिस्तान को अस्थिर करने वाली गतिविधियों का केंद्र बनने की आशंका है, जो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है।
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  • पाकिस्तान बलूच अलगाववादी और इस्लामवादी आतंकवाद, दोहरी आंतरिक चुनौती से जूझ रहा है।
  • देश आतंकवाद को महज एक सुरक्षा समस्या मानता है, वैचारिक जड़ों को अनदेखा कर रहा है।
  • कट्टरता और चरमपंथी विचारों को खत्म करने के लिए कोई ठोस या निरंतर प्रयास नहीं किए गए हैं।
  • बलूच विद्रोह का सामना मुख्य रूप से सैन्य बल के प्रयोग से किया जा रहा है, जो समस्या को जटिल बना सकता है।
  • पड़ोसी अफगानिस्तान की अस्थिरता पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन रही है।

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स्रोत: Dainik Bhaskar

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