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भारत की व्यापार नीति: संरक्षणवाद से समझौते की ओर बढ़ते कदम राजनीति India Trade Policy Evolution Politics

Political update: Policy buzz: भारतीय व्यापार नीति और इसके वैश्विक प्रभाव आजकल गहन चर्चा का विषय बने हुए हैं। एक ओर जहां अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर इसकी टैरिफ संरचना पर भी नजर रखी जा रही है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत को “टैरिफ का राजा” कहा जाना भले ही विवादित रहा हो, लेकिन यह संकेत देता है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत के पास संभवतः सबसे ऊँची टैरिफ दीवारें और कई गैर-टैरिफ व्यापार बाधाएं हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए यह उचित होगा कि वह अपनी व्यापार नीतियों को और अधिक उदार बनाए। टैरिफ और गैर-टैरिफ दोनों प्रकार की बाधाओं को कम करने से देश की आर्थिक वृद्धि को गति मिल सकती है। व्यापारिक अवरोध किसी भी राष्ट्र के विकसित बनने की राह में एक बड़ा रोड़ा साबित होते हैं। वर्तमान ‘आत्मनिर्भर भारत’ की अवधारणा देश की मौजूदा व्यापारिक रणनीति का मूल है, जिसने पिछले एक दशक से अधिक समय में कई बदलाव देखे हैं।

इस नीति के तहत, बीते लगभग बारह वर्षों में, केंद्र सरकार ने टैरिफ दरों में वृद्धि की है, साथ ही बड़ी संख्या में गैर-टैरिफ बाधाएं भी खड़ी की हैं। इसके अलावा, सरकार ने विभिन्न व्यापार समझौतों से दूरी बनाए रखी है। यह चिंता का विषय है कि जहां भारतीय मीडिया अक्सर ट्रंप के टैरिफों की कड़ी आलोचना करता था, वहीं मोदी सरकार द्वारा अपनाई जा रही पूर्व कांग्रेस-युग की संरक्षणवादी नीतियों की वापसी को अक्सर खामोशी से स्वीकार कर लिया जाता है। यह प्रवृत्ति भारत के दीर्घकालिक हितों के अनुकूल नहीं मानी जा रही है।

भारत के आर्थिक इतिहास पर गौर करें तो, 1980 के दशक में देश की औसत टैरिफ दर लगभग 125% थी। इतनी ऊँची दरों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘आत्मनिर्भर’ बनाने के बजाय उसे वैश्विक स्तर पर गैर-प्रतिस्पर्धी बना दिया था। उन देशों के विपरीत, जिन्होंने व्यापार के माध्यम से आर्थिक समृद्धि प्राप्त की, जैसे पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र, भारत की इस संरक्षणवादी नीति ने उसकी अर्थव्यवस्था को धीमी विकास दर के दुष्चक्र में फंसा दिया। उस दौर में भारत को अक्सर “बास्केट केस” कहा जाता था, जिसका अर्थ था कि देश गंभीर वित्तीय संकटों में घिरा है और अपने ऋण चुकाने में भी अक्षम है। 1990 में यही भयावह स्थिति सामने आई, जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 1 अरब डॉलर से भी कम रह गया, जो मुश्किल से तीन सप्ताह के आयात के लिए ही पर्याप्त था। इस गंभीर संकट से निकलने के लिए भारत को अपने स्वर्ण भंडार को बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखना पड़ा और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से 2 अरब डॉलर का आपातकालीन ऋण लेना पड़ा, जिसके साथ अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन की कड़ी शर्तें जुड़ी हुई थीं।

इस संकट के बाद के दो दशकों में, भारत ने अपनी व्यापार नीतियों में महत्वपूर्ण बदलाव किए। सरकारों ने टैरिफ दरों को लगातार कम किया और 2013 तक प्रभावी टैरिफ दर घटकर 13% रह गई थी। इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया। हालांकि, ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत वर्तमान सरकार ने न केवल उदारीकरण की इस गति को धीमा कर दिया है, बल्कि टैरिफ भी धीरे-धीरे फिर से बढ़ने लगे हैं। 2021 तक प्रभावी टैरिफ दर बढ़कर 18% हो गई है, जो पूर्व की सुधारवादी नीतियों से उलट एक प्रवृत्ति है। इसके अतिरिक्त, गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCOs) जैसे गैर-टैरिफ बाधाएं भी लगातार बढ़ रही हैं।

यह नीतिगत बदलाव भारत के आर्थिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ रखता है। जहां एक ओर देश अपनी घरेलू विनिर्माण क्षमता को बढ़ावा देना चाहता है, वहीं व्यापारिक अवरोधों को बढ़ाना वैश्विक प्रतिस्पर्धा और आर्थिक विकास की राह में चुनौतियां खड़ी कर सकता है। ऐसे में, व्यापारिक समझौतों की ओर बढ़ना और टैरिफ बाधाओं को संतुलित करना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। Stay updated with साधनान्यूज़.com for more news.

  • भारत को विश्व में सबसे ऊँची टैरिफ दीवारों और गैर-टैरिफ बाधाओं वाले देशों में गिना जा रहा है।
  • ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत टैरिफ और व्यापार बाधाओं में वृद्धि दर्ज की गई है।
  • 1980 के दशक में भारत की 125% औसत टैरिफ दर ने अर्थव्यवस्था को गैर-प्रतिस्पर्धी बना दिया था, जिसके कारण 1990 में वित्तीय संकट आया।
  • 1990 के संकट के बाद भारत ने व्यापार उदारीकरण की राह अपनाई और 2013 तक प्रभावी टैरिफ दर 13% तक गिर गई थी।
  • वर्तमान में, उदारीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है और प्रभावी टैरिफ दर बढ़कर 18% (2021 तक) हो गई है।
  • गैर-टैरिफ बाधाओं, जैसे क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स (QCOs), का भी हाल के वर्षों में विस्तार हुआ है।

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स्रोत: Dainik Bhaskar

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