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सर्वोच्च न्यायालय की अरावली पर गंभीर चिंता: अवैध खनन रोकने के लिए कड़े निर्देश Supreme Court Aravalli Mining Directives

Policy buzz: **Government watch:** भारत की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखला अरावली के पर्यावरण संतुलन पर मंडराते खतरे को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने गहरी चिंता व्यक्त की है। अवैध खनन गतिविधियों ने इस ऐतिहासिक पर्वतमाला को भीतर से खोखला कर दिया है, जिससे न केवल पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुँच रही है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। न्यायालय ने इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया है।

21 जनवरी को, भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और इसकी मूल समस्या, यानी अवैध खनन पर तत्काल रोक लगाने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। न्यायालय के नवीनतम निर्देशों को दो मुख्य भागों में समझा जा सकता है। एक ओर, सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली क्षेत्र में अवैध खनन पर प्रभावी नियंत्रण के लिए ठोस कार्ययोजना बनाने के निर्देश दिए हैं, वहीं दूसरी ओर, अरावली पर्वतमाला की सटीक परिभाषा तय करने के मुद्दे पर भी गंभीरता से विचार करने को कहा है।

न्यायालय ने दिसंबर के उस आदेश को फिलहाल यथावत रखा है जिसमें अरावली के 100 मीटर के दायरे में गतिविधियों को ‘केप्ट इन एवियांस’ रखा गया था। इसके साथ ही, इस जटिल विषय पर विशेषज्ञ समिति के गठन के लिए योग्य नामों और सुझावों की मांग की गई है। आगामी चार सप्ताह के भीतर दोबारा सुनवाई होने तक, कार्ययोजना और विशेषज्ञों के नामों व सुझावों को प्रस्तुत करने का समय दिया गया है। अवैध खनन गतिविधियों के प्रति सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष गंभीरता दर्शाई है, यह स्पष्ट करते हुए कि वैध और अवैध खनन की बहस से परे हटकर देखा जाए तो यह साफ है कि अरावली को वैध खनन से कहीं अधिक क्षति अवैध गतिविधियों के कारण हुई है।

यह चिंता केवल पर्यावरणविदों तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण समाज और देश के लिए महत्वपूर्ण है। एक अनुमान के अनुसार, अरावली पर्वतमाला का निर्माण लगभग 2 अरब वर्ष पूर्व प्रोटेरोजोइक युग में हुआ था, जो इसे दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक बनाता है। यह पर्वत श्रृंखला राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर और गुजरात तक विस्तृत है, जिसमें अकेले राजस्थान के लगभग 20 जिले शामिल हैं। अरावली की कोख में मेसनरी स्टोन से लेकर महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों का अथाह भंडार है।

हालांकि, राजस्थान की तुलना में हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के क्षेत्रों में अरावली को अधिक नुकसान पहुँचाया गया है। यह आरोप-प्रत्यारोप का समय नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए अरावली के संरक्षण की आवश्यकता को समझने का है। इस प्राचीन विरासत को बचाना वर्तमान समय की मांग और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है।

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  • सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला में अवैध खनन पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
  • न्यायालय ने अवैध खनन पर प्रभावी नियंत्रण और अरावली की स्पष्ट परिभाषा तय करने पर बल दिया।
  • 100 मीटर के दायरे से संबंधित पिछले आदेश को बरकरार रखा गया, विशेषज्ञ समिति के गठन के सुझाव मांगे गए।
  • कार्ययोजना और विशेषज्ञों के नामों के लिए चार सप्ताह का समय निर्धारित किया गया है।
  • यह पाया गया कि वैध खनन की तुलना में अवैध खनन ने अरावली को अधिक क्षति पहुँचाई है।
  • अरावली पर्वतमाला 2 अरब वर्ष पुरानी है और इसका संरक्षण वर्तमान की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

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स्रोत: Prabhasakshi

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