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दिल्ली कोर्ट का अहम फैसला: पुलिसकर्मी पर गोली चलाने के प्रयास के आरोपी प्रभु कुम… Delhi Court Policeman Shooting Verdict

India today: India news: दिल्ली की एक अदालत ने वर्ष 2018 के एक बहुचर्चित मामले में अहम फैसला सुनाया है। द्वारका क्षेत्र में रात के समय चेकिंग अभियान के दौरान एक पुलिसकर्मी पर कथित तौर पर गोली चलाने का प्रयास करने के आरोपी व्यक्ति को कोर्ट ने सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को “संदेह से परे” साबित करने में पूरी तरह से विफल रहा। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में सबूतों के महत्व और ‘संदेह का लाभ’ के सिद्धांत को रेखांकित करता है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वंदना जैन ने प्रभु कुमार नामक व्यक्ति को कई गंभीर आरोपों से मुक्त किया। इन आरोपों में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 186 (लोक सेवकों के सार्वजनिक कार्यों में बाधा डालना), धारा 353 (लोक सेवक पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग), धारा 324 (खतरनाक हथियारों या साधनों से स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), और सबसे महत्वपूर्ण, धारा 307 (हत्या का प्रयास) शामिल थीं। इसके अतिरिक्त, प्रभु कुमार को शस्त्र अधिनियम की धारा 27 (हथियारों और गोला-बारूद का अवैध उपयोग) और मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185 (नशे की हालत में वाहन चलाना) के तहत लगे आरोपों से भी बरी कर दिया गया।

अदालत ने पूरे मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए सबूतों और गवाहियों में कई “गंभीर कमियां” और विसंगतियां पाईं। इन खामियों के कारण, अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि आरोपी के खिलाफ लगे आरोपों को ठोस रूप से स्थापित नहीं किया जा सका।

यह पूरा मामला 31 अक्टूबर, 2018 की एक घटना से जुड़ा था। उस रात द्वारका के सेक्टर 21 अंडरपास के पास एक पुलिस पिकेट पर वाहनों की जांच चल रही थी। पुलिस अधिकारियों ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि प्रभु कुमार नामक व्यक्ति कथित तौर पर शराब के नशे में था और उसने चेकिंग के दौरान तैनात पुलिसकर्मियों के साथ अभद्रता की। आरोप था कि उसने एक कांस्टेबल के अंगूठे में चोट पहुंचाई और इसके बाद एक सहायक उप-निरीक्षक (ASI) की ओर अपनी लाइसेंसी पिस्तौल तान दी। हालांकि, पुलिस के अनुसार, उस समय गोली नहीं चली थी।

अपने 15 जनवरी को सुनाए गए निर्णय में, अदालत ने कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए कहा, “यह अभियोजन पक्ष का कानूनी दायित्व है कि वह प्रत्येक अपराध को किसी भी संदेह से परे जाकर साबित करे। यदि अभियोजन पक्ष इसमें विफल रहता है, तो आरोपी को संदेह का लाभ मिलना अनिवार्य है।”

इस महत्वपूर्ण फैसले ने एक बार फिर से आपराधिक न्याय प्रणाली में सबूतों की गुणवत्ता और अभियोजन की जिम्मेदारी पर जोर दिया है। यह दिखाता है कि सिर्फ आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें पुख्ता और निर्विवाद सबूतों के साथ साबित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस निर्णय से पुलिस जांच प्रक्रियाओं में और अधिक सतर्कता तथा सटीकता की आवश्यकता पर बल मिलता है ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

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  • दिल्ली की अदालत ने प्रभु कुमार को पुलिसकर्मी पर गोली चलाने के प्रयास के आरोप से बरी किया।
  • अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को ‘संदेह से परे’ साबित करने में विफल रहा।
  • यह मामला 2018 में द्वारका में पुलिसकर्मी से बदसलूकी और लाइसेंसी पिस्तौल तानने की घटना से जुड़ा था।
  • अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वंदना जैन ने आरोपी को आईपीसी की धारा 186, 353, 324, 307 सहित कई धाराओं से मुक्त किया।
  • फैसले ने आपराधिक न्याय प्रणाली में ‘संदेह का लाभ’ के सिद्धांत के महत्व को रेखांकित किया।

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स्रोत: Prabhasakshi

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