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वैश्विक राजनीति: प्रवासी और शरणार्थी क्यों बन रहे हैं सुरक्षा चुनौती? Global Crises Authoritarianism Instability

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वैश्विक राजनीति: प्रवासी और शरणार्थी क्यों बन रहे हैं सुरक्षा चुनौती? Global Crises Authoritarianism Instability

साधनान्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, नए साल में भी दुनिया की तस्वीर संघर्षों और सत्तावाद से घिरी हुई है, जिससे वैश्विक संस्थाएँ कमजोर पड़ रही हैं।

बढ़ती आर्थिक विषमता के बीच, सबसे चिंताजनक स्थिति ‘दूसरों’ यानी प्रवासियों और शरणार्थियों के प्रति पनपती नफरत है।

दुनिया भर में अनेक **राजनेता** इन प्रवासियों और शरणार्थियों को एक खतरे के रूप में पेश कर रहे हैं, जो द्वितीय विश्व युद्ध की पूर्व संध्या पर डब्ल्यूएच ऑडेन की कविता ‘रिफ्यूजी ब्लूज’ की चेतावनी भरी पंक्तियों की याद दिलाता है, जहाँ वक्ता कहता है कि ‘अगर हम उन्हें भीतर आने देंगे, तो वे हमारी रोजी-रोटी छीन लेंगे।

’ इस ‘जेनोफोबिया’ यानी परदेसियों से भय का उभार किसी आकस्मिक घटना के रूप में नहीं हो रहा है, बल्कि यह गहरे संरचनात्मक बदलावों से प्रेरित है।

हम अक्सर भूल जाते हैं कि राष्ट्र-राज्य एक अपेक्षाकृत नई अवधारणा है, जो ऐसे समय में विकसित हुई जब यात्राएँ धीमी और सीमित थीं।

उस दौर में, दुनिया को अलग-अलग समुदायों के समूह के रूप में देखना तार्किक था, जहाँ प्रत्येक समुदाय अपने सदस्यों के कल्याण के लिए स्वयं जिम्मेदार होता था।

इन इकाइयों को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए एक साझा पहचान आवश्यक थी, जो एक खास वर्ग के लोगों को नागरिकता और सुरक्षा का अधिकार देती थी, जबकि ‘बाहरी’ लोगों को इन अधिकारों से वंचित रखा जाता था।

आज की दुनिया में, जहाँ तकनीक और वैश्वीकरण ने यात्राओं और संपर्क को असीमित बना दिया है, यह पुरानी सोच अब अप्रासंगिक लगने लगी है।

फिर भी, **राजनीति** में **नेता** अक्सर इस पुरानी मानसिकता का सहारा लेकर लोगों को एकजुट करने और अपने **चुनाव** अभियानों को मजबूत करने का प्रयास करते हैं।

वे प्रवासियों को आर्थिक बोझ, सामाजिक तनाव या सुरक्षा जोखिम के रूप में चित्रित करते हैं, जिससे भय और असुरक्षा की भावना बढ़ती है।

हालांकि, आंकड़े अक्सर इस बात का खंडन करते हैं।

उदाहरण के लिए, जर्मनी ने 2015-16 में 10 लाख से अधिक शरणार्थियों का स्वागत किया, और वहाँ की अर्थव्यवस्था पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा, बल्कि इससे श्रम बाजार में सुधार आया।

इसी तरह, भारत में भी विभिन्न राज्यों के लोग अक्सर काम की तलाश में पलायन करते हैं, और यह गतिशीलता आर्थिक वृद्धि में योगदान करती है।

जब कोई **नेता** या **राजनीतिक** दल प्रवासियों को खतरा बताते हैं, तो वे अक्सर एक जटिल सामाजिक और आर्थिक मुद्दे को सरल बनाकर ध्रुवीकरण पैदा करते हैं।

दरअसल, दुनिया को अब एक साझा पहचान पर आधारित संकीर्ण राष्ट्र-राज्य की बजाय, ऐसे वैश्विक गाँव के रूप में देखना होगा जहाँ नागरिकता, समानता और मानवाधिकारों का आधार एक व्यापक मानवतावादी दृष्टिकोण हो।

यह दृष्टिकोण न केवल प्रवासियों और शरणार्थियों के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित करेगा, बल्कि यह **वैश्विक राजनीति** में स्थिरता और सहयोग को भी बढ़ावा देगा।

यह आवश्यक है कि सभी देशों में **राजनीतिक** इच्छाशक्ति हो ताकि इस चुनौती का सामना एक मानवीय और तर्कसंगत तरीके से किया जा सके।

  • दुनियाभर में **प्रवासियों** और शरणार्थियों के प्रति बढ़ती नफरत चिंता का विषय।
  • **राजनेता** अपने **चुनाव** अभियानों के लिए प्रवासियों को खतरे के रूप में पेश करते हैं।
  • राष्ट्र-राज्य की पुरानी अवधारणा आज के वैश्विक परिदृश्य में अप्रासंगिक होती जा रही है।

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Posted on 10 January 2026 | Stay updated with साधनान्यूज़.com for more news.

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