ज्ञान की शक्ति: धर्म पथ पर कर्म का महत्व कैसे प्रकाशित होता है? True Knowledge Needs Application
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ज्ञान की शक्ति: धर्म पथ पर कर्म का महत्व कैसे प्रकाशित होता है? True Knowledge Needs Application
साधनान्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, एक संत और उनके दो शिष्यों की प्रचलित लोक कथा हमें ज्ञान के वास्तविक महत्व से परिचित कराती है, जब तक हम इसे अपने जीवन में लागू नहीं करते, तब तक उसका कोई सार्थक लाभ नहीं मिलता।
पुराने समय में, एक अत्यंत विद्वान संत अपने आश्रम में शिष्यों के साथ रहते थे, जिनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी।
लोग अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढने उनके पास आते थे।
एक दिन, शिष्यों की शिक्षा पूर्ण होने पर, संत ने उन्हें एक धार्मिक यात्रा पर जाने से पहले गेहूं से भरे डिब्बे दिए और उन्हें सुरक्षित लौटाने की जिम्मेदारी सौंपी।
संत के तीर्थ यात्रा पर जाने के बाद, दोनों शिष्यों ने गुरु की अमानत को संभालने के लिए भिन्न-भिन्न मार्ग अपनाए।
पहले शिष्य ने गेहूं से भरे डिब्बे को अपने घर के मंदिर में रख दिया।
उसने इसे एक पवित्र वस्तु मानकर प्रतिदिन उसकी पूजा अर्चना की, इस विश्वास के साथ कि देवता और श्रद्धा से पूजा-पाठ करने से गुरु का गेहूं सुरक्षित रहेगा।
वहीं, दूसरे शिष्य ने एक व्यवहारिक और दूरदर्शी तरीका अपनाया।
उसने गेहूं को डिब्बे से निकाला और उन्हें अपने खेत में बो दिया।
उसने परिश्रम से खेत की देखभाल की और जब फसल तैयार हुई, तो उसने उसमें से कुछ गेहूं फिर से बो दिया और बाकी का उपयोग जरूरतमंदों की सेवा में किया, जिससे ज्ञान का सही मायने में प्रसार हुआ।
एक वर्ष बाद, जब संत अपनी यात्रा से लौटे, तो उन्होंने शिष्यों से गेहूं लौटाने को कहा।
पहले शिष्य ने वही पुराना डिब्बा संत को अर्पित किया, लेकिन उसमें रखा गेहूं नमी और समय के कारण खराब हो चुका था, उसमें घुन लग गए थे।
जबकि, दूसरे शिष्य ने संत के चरणों में ताजे और प्रचुर मात्रा में गेहूं के दाने रखे, जो उसने कई फसलों से एकत्र किए थे, और बताया कि उसने कैसे उन दानों का उपयोग कई गुना बढ़ाने और समाज सेवा में किया।
संत ने मुस्कुराते हुए समझाया कि वास्तविक ज्ञान और धर्म सिर्फ किताबों में या मंदिर की पूजा में नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में कर्म के माध्यम से लागू करने में निहित है।
उन्होंने बताया कि ज्ञान को निष्क्रिय रखने से वह नष्ट हो जाता है, जबकि उसका उपयोग और प्रसार ही उसे सार्थक बनाता है और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।
- ज्ञान को केवल सहेजने से नहीं, बल्कि लागू करने से ही उसका वास्तविक फल मिलता है।
- दो शिष्यों की कहानी सिखाती है कि धर्म का मार्ग सक्रिय कर्म से ही प्रशस्त होता है।
- आध्यात्मिक उन्नति के लिए निष्क्रिय भक्ति से अधिक सक्रिय सेवा और कर्म आवश्यक है।
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Posted on 09 January 2026 | Stay updated with साधनान्यूज़.com for more news.
