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नारद मुनि का अभिमान भंग: विष्णु लीला से धर्म का मर्म क्या है? Narada’s Pride Vishwamohini Spiritual Trap

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नारद मुनि का अभिमान भंग: विष्णु लीला से धर्म का मर्म क्या है? Narada's Pride Vishwamohini Spiritual Trap news image

नारद मुनि का अभिमान भंग: विष्णु लीला से धर्म का मर्म क्या है? Narada’s Pride Vishwamohini Spiritual Trap

साधनान्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, देवर्षि नारद का अभिमान उनके आध्यात्मिक मार्ग में एक बड़ी बाधा बनने लगा था।

भगवान विष्णु के समक्ष उपस्थित होने के बावजूद, उनका मन विश्वमोहिनी के मोहपाश में जकड़ा हुआ था।

नारद मुनि ने अपनी इच्छा पूर्ति के लिए श्रीहरि को मात्र एक साधन समझा, जैसे एक अज्ञानी व्यक्ति अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु किसी देवता के सामने बलि का बकरा समझता है।

उनकी यह अवस्था एक महत्वपूर्ण **धार्मिक** संदेश देती है कि कैसे मनुष्य अपने स्वार्थ में ईश्वर के सच्चे स्वरूप और उनकी **लीला** को समझने में चूक कर जाता है।

वे अपने काम साधने के लिए राम का प्रयोग कर रहे थे, और श्रीहरि के वचनों को अपने मनमाफिक ढंग से ग्रहण कर रहे थे।

भगवान विष्णु ने नारद मुनि के इस अहंकार और कामुकता को भांप लिया था।

उन्होंने अपने अगले वचन पूर्ण करते हुए कहा, ‘कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी।

बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी।

एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ।

कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ।

‘ इन शब्दों का गहरा **आध्यात्मिक** अर्थ है कि एक वैद्य कभी भी रोग से पीड़ित व्यक्ति को वह वस्तु नहीं देता जो उसके लिए हानिकारक हो, भले ही रोगी उसे माँगे।

इसी प्रकार, भगवान ने स्पष्ट किया कि वे नारद मुनि का वास्तविक हित करना चाहते हैं, न कि उनकी क्षणिक इच्छाओं की पूर्ति।

यह कहकर **देवता** श्रीहरि अंर्तध्यान हो गए।

उनका यह कृत्य नारद मुनि के अभिमान को तोड़ने और उन्हें सही मार्ग पर लाने की एक सोची-समझी **लीला** थी, जो **धर्म** के गूढ़ रहस्यों को उजागर करती है।

यह घटना हमें सिखाती है कि हमारी **पूजा** और भक्ति केवल स्वार्थ पूर्ति का माध्यम नहीं होनी चाहिए।

सच्चे **तीर्थ** और **मंदिर** में ईश्वर की आराधना का उद्देश्य आत्म-शुद्धि और आध्यात्मिक विकास होता है।

भगवान विष्णु का संदेश स्पष्ट था कि वे नारद को काम के दलदल में नहीं धकेलेंगे, बल्कि उनके लिए जो सर्वोत्तम है, वही करेंगे।

नारद का यह अभिमान, जो उन्हें स्वयं **भगवान विष्णु** से भी ऊपर समझने पर मजबूर कर रहा था, अब टूटने के कगार पर था।

यह प्रकरण **धर्म** और नैतिकता के सिद्धांतों को मजबूती प्रदान करता है, जहां ईश्वर अपने भक्तों को उनकी गलतियों से सीख कर सही मार्ग पर लौटने का अवसर देते हैं।

  • नारद मुनि ने भगवान विष्णु को केवल अपनी स्वार्थ सिद्धि का माध्यम समझा।
  • भगवान विष्णु ने नारद को कुपथ पर न चलने की आध्यात्मिक शिक्षा दी।
  • श्रीहरि के अंर्तध्यान होने से नारद के अभिमान भंग की लीला का आरंभ।

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Posted on 30 December 2025 | Stay updated with साधनान्यूज़.com for more news.

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