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श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्यों सिखाया: आध्यात्मिक सफलता में अहंकार त्यागना ही धर्म… Arrogance Corrupts Success Knowledge

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श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्यों सिखाया: आध्यात्मिक सफलता में अहंकार त्यागना ही धर्म... Arrogance Corrupts Success Knowledge news image

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्यों सिखाया: आध्यात्मिक सफलता में अहंकार त्यागना ही धर्म… Arrogance Corrupts Success Knowledge

साधनान्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, महाभारत का संदेश सदियों से हमें धर्म और जीवन के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराता रहा है।

इसी कड़ी में, सफलता और ज्ञान के साथ अहंकार के जुड़ने से होने वाले पतन को श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक प्रेरक प्रसंग के माध्यम से समझाया, जिसका गहरा आध्यात्मिक महत्व है।

कुरुक्षेत्र का युद्ध मैदान, जो ज्ञान के तीर्थ स्थल से कम नहीं था, वहाँ जब पराक्रमी धनुर्धर अर्जुन और कर्ण आमने-सामने आए, तो युद्ध का एक ऐसा क्षण आया जिसने अहंकार की निरर्थकता को उजागर किया।

युद्ध के दौरान अर्जुन के बाणों की मार से कर्ण का रथ 20-25 हाथ पीछे खिसक जाता था, जबकि कर्ण के शक्तिशाली बाण भी अर्जुन के रथ को बहुत थोड़ा ही विचलित कर पाते थे।

आश्चर्य की बात यह थी कि जब कर्ण के बाण अर्जुन के रथ पर लगते, तो देवता स्वरूप श्रीकृष्ण उसके पराक्रम की प्रशंसा करते थे, लेकिन जब अर्जुन के बाण कर्ण के रथ को पीछे धकेलते, तब वे मौन रहते थे।

इस विचित्र व्यवहार ने अर्जुन के मन में भ्रम और अपने पराक्रम के प्रति अहंकार को जन्म दिया।

उसने केशव से प्रश्न किया कि उसके बाण कर्ण के रथ को इतना पीछे कर देते हैं, फिर भी प्रशंसा कर्ण की होती है; क्या कर्ण के बाण उससे अधिक शक्तिशाली हैं?

अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण ने उस महान सत्य का प्रकाश डाला जो हमारी सफलता के पीछे छिपी अनेक शक्तियों को दर्शाता है।

उन्होंने समझाया कि अर्जुन के रथ पर स्वयं वे (श्रीकृष्ण) सारथी के रूप में विराजमान हैं, ध्वज पर पवनपुत्र हनुमान जी स्वयं रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हैं, और रथ के पहियों की दृढ़ता भी अतुलनीय है।

इन तीनों दिव्य शक्तियों के संयुक्त प्रभाव के कारण ही कर्ण के प्रचंड बाण भी अर्जुन के रथ को अधिक हिला नहीं पाते थे।

उन्होंने अर्जुन को धर्म का यह मर्म समझाया कि हमारी हर सफलता में कई अदृश्य और दृश्य शक्तियां सहायक होती हैं – जैसे परिवार का सहयोग, गुरु का मार्गदर्शन, अनुकूल परिस्थितियां और सबसे बढ़कर ईश्वर की कृपा।

इसलिए व्यक्ति को कभी भी अपनी उपलब्धि पर अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसमें उसके व्यक्तिगत प्रयास के साथ-साथ कई अन्य कारकों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है।

यह प्रसंग हमें विनम्रता, कृतज्ञता और उन अदृश्य शक्तियों के प्रति पूजा भाव के आध्यात्मिक महत्व की शिक्षा देता है।

यह शिक्षा हमारे हृदय में धर्म और पूजा का एक ऐसा मंदिर बनाती है, जहाँ अहंकार का कोई स्थान नहीं।

  • श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सफलता में अहंकार त्यागने की शिक्षा दी।
  • हमारी हर सफलता में कई अदृश्य शक्तियां सहायक होती हैं।
  • विनम्रता और कृतज्ञता का आध्यात्मिक महत्व समझाया।

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Posted on 21 December 2025 | Keep reading साधनान्यूज़.com for news updates.

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